कश्मीरी हिन्दूओं का दर्द



कट्टरता और इस्लाम के नाम पर आज आतंक चारों ओर फैल रहा है, जिसमें  हजारों-लाखों निरपराध, असहाय स्त्री-पुरुषों-बच्चों को उनकी गोलियों का  शिकार होना पड़ रहा है और जिसे रोकने के लिए अनेक देशों के सम्मिलित प्रयास  भी पूरी तरह कारगार नहीं हो पा रहे हैं|

कश्मीर के हिन्दूओं  का विस्थापन वर्तमान समय में हमारे देश के सबसे ममस्पर्शी और विचारोत्तेजक  विषयों में से एक है| कुछ महीनों पहले मैंने प्रेमनाथ शाद की एक कविता "घर  त्यागा/ और भागा" पढ़ा जिसमें उन्होंने कश्मीर के एक हिन्दू किसान की  मर्मातक व्यथा का अपूर्व चित्रण किया है| इसके अलावा मुझे डॉक्टर कुंदनलाल  चौधरी की संकलित कविता संग्रह "ऑफ गौड, मैन एंड मिलिटेंट्स" में से कुछ को  पढ़ने का मौका मिला जो अपने आप में अनूठी रचनायें हैं| चलिए यहाँ से आगे मुद्दे की ओर बढते हैं...

आतंकवादियों  ने कश्मीर में मात्र सरकारी संपत्तियों को ही नहीं जलाया, बल्कि अनेक  हिन्दू मंदिरों को जलाकर नष्ट कर दिया| सन १९९० में जब कश्मीर में आतंकवाद  फैला तो सबसे पहले दौर में भद्रवाद के सुपारनाग एवं अटालगढ़ मंदिरों को  जलाकर राख कर दिया गया| ६ दिसंबर, १९९२ को अयोध्या की ऐतिहासिक घटना के बाद  पूरे जिले में १८ मंदिरों को जला दिया गया| ये सभी मंदिर भगवान शिव एवं  माँ शक्ति के थे| हिन्दूओं को आतंकित करने के लिए संध्या होते ही बम  विस्फोट का क्रम प्रारम्भ हो जाता| कभी-कभी तो सैकड़ों बम विस्फोट एक ही रात  में होने लगे| बाद में ये विस्फोट मंदिरों, हिन्दू नेताओं के घरों और  सार्वजनिक स्थानों पर होने लगे|

कुछ तथ्य:-
२ अप्रैल, १९८९ को भद्रवाह के श्रीवासुकि नाग मंदिर को आतंकवादियों ने बम विस्फोट कर क्षतिग्रस्त कर दिया|
८ नवम्बर, १९८९ को भद्रवाह के कुटोन गाँव के शिव मंदिर को बम विस्फोट से ध्वस्त कर दिया|
सन १९९० में सुपारनाग एवं अटालगढ़ के मंदिरों को भी आतंकवादियों ने जलाकर राख कर दिया|
१७ जून, १९९० को भद्रवाह में स्थित श्रीलक्ष्मीनारायण मंदिर में बम फेंका|      
नवम्बर  १९९२ में आतंकवादियों ने किश्तवाड़ के सरथल नामक क्षेत्र के अग्राल गाँव से  माता अष्टादश भुजा, माता श्रीसरथल देवी की अति प्राचीन भव्य मूर्ति चुरा  ली| लेकिन बाद में हिन्दू समाज द्वारा आंदोलन करने के डेढ़ महीने बाद माता  की मूर्ति प्राप्त हो गई|
६ दिसंबर, १९९२ को अयोध्या में जब  श्रीराम जन्मभूमि-बाबरी ढाँचा तोड़ने के विरोध में कश्मीर के मंदिरों को  आतंकवादियों ने अपना निशाना बनाया| इस दिन मात्र डोडा तहसील में ही दस  मंदिरों को आतंकवादियों ने अग्नि की भेंट चढ़ा दी जिनके नाम ये हैं :-
भारत गाँव में - भागला मंदिर
बजारनी क्षेत्र में - मशला मंदिर
चतरू के गाडी गाँव में - चतरू मंदिर
घंदल क्षेत्र में - कुंडधार मंदिर
काश्तीगढ़ क्षेत्र का मंदिर
कुल्हांड जिनी का मंदिर
देधनी में हंबल क्षेत्र का मंदिर
बरशाला का मंदिर
ओगाद का मंदिर
लाल दरमान का मंदिर
१० अगस्त, १९९३ को कैलास कुंड की मूर्तियों को नष्ट कर दिया गया|
मई  १९९५ में चरारे शरीफ को कश्मीर घाटी में जलाकर राख करने के विरोध में  आतंकवादियों ने मंदिरों पर हमला शुरू कर दिया जिसमें भद्रवाह के वासुकि नाग  मंदिर में हथगोला फेंककर हमला किया गया|
१४ मई, १९९५ को डोडा मुख्यालय नगर में श्रीलक्ष्मीनारायण मंदिर में हथगोला फेंका गया|
मई १९९५ में भलेस तहसील में भी आतंकवादियों ने तीन मंदिरों को तोड़कर अग्नि के हवाले कर दिया|
१९९५ में ही डोडा तहसील के भी तीन मंदिरों को तोड़कर आतंकवादियों ने उनमें आग लगा दी|  
१९  अगस्त, १९९५ को आतंकवादियों ने कश्मीर की विशाल एवं प्रसिद्ध लंबी धार्मिक  "मणिमहेश यात्रा" के दौरान यात्रियों पर हमला कर भगवान भोले की मूर्तियां  भंग कर दी|
१८ फरवरी, १९९६ को भद्रवाह के किलाड क्षेत्र के शिव मंदिर को जलाकर राख कर दिया गया|

कश्मीरी  हिन्दू अपनी इच्छा से अपने घर छोड़कर नहीं गए| उनके कारोबार, घर-बार सब  तबाह हो गए और यह सब वहाँ सरकार द्वारा सुरक्षा प्रदान कर सकने में अक्षमता  के कारण ही हुआ| उन्होंने सरकार के प्रति अपना कर्तव्य निभाने में कभी कोई  कोताही नहीं बरती, हमेशा सरकारी आदेशों का पालन किया| राष्ट्र की  धर्म-निरपेक्ष नीति को मानने के साथ-साथ मुसलमानों को अपना भाई मानकर सदा  उनके प्रति सदभावना अपनाई| परन्तु कश्मीरी हिन्दू उन्हीं तथाकथित "भाईयों"  की कट्टरपंथी नीतियों का शिकार हो गए| कश्मीर के हर नागरिक को सुरक्षा  प्रदान करना सरकार का प्रथम कर्तव्य था जिसमें हर सरकार असफल रही| उनके भाई  कहलाने वाले मुसलमानों ने जब उनपर हमले किये तो उनका कोई पड़ोसी मुसलमान भी  उनकी रक्षा करने को आगे नहीं आया| शताब्दियों से एक साथ रहने वाले  परिवारों ने भी जब अपने हम-मजहबो को उनके परिजनों की हत्या करते, उन्हें  लुटते या उनकी बहु-बेटियों की अस्मत लुटते देखा, तो उन्होंने भी चुपचाप  दरवाजे बंद कर लिए| खुली आँखों से कुछ ना देखने का नाटक किया गया| यह मिला  उन कश्मीरी हिन्दूओं को धर्म-निरपेक्षता का सिला|

ऐसा लगता  है कि हर सरकार वहाँ मुस्लिम-परस्ती के चक्कर में, वोट की राजनीति के घेरे  में और कश्मीर के दहशतपसंदों पर कोई सख्ती ना करने का संकल्प लेकर सत्ता में  आती है| यही कारण हो सकता है कि उन मुठ्ठी-भर दहशतगर्दों ने कश्मीर में  अपनी हुकूमत कायम कर रखी है और उसके मुकाबले बड़े से दिखने वाली सरकार उसके  सम्मुख बार-बार झुक जाती है| इस सबका तो एक ही अर्थ निकलता है कि वो सारे  कश्मीरी हिन्दू अपनी सरकार की कमजोरी का शिकार हुए हैं| अलग-अलग जगहों से  प्राप्त जानकारी के अनुसार कश्मीर में हिन्दूओं के खाली पड़े मंदिरों पर  अवैध कब्जे की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है| मंदिरों की जमीनों अवैध  रूप से कब्जा कर उन्हें या तो बेचा जा रहा है या फिर उस पर रिहायशी  निर्माण खड़े किये जा रहे हैं| इससे भी गंभीर बात यह है कि इतना सब कुछ गलत  होने के साथ-साथ मंदिरों में विराजमान देवी-देवताओं की मूर्तियों को भी  गायब किया जा रहा है| हद तो तब है कि आतंकवादी और कट्टरपंथी संगठनों की इस  साजिश का पर्दाफाश होने के बाद भी सरकार द्वारा कोई कार्रवाई नहीं हुई है  जिसके परिणामस्वरूप हम सभी ये मानने को विवश हैं कि मंदिरों सहित सभी  हिन्दू अस्मिता के चिन्हों के संरक्षण की मांग पर सरकार द्वारा कोई गंभीरता  नहीं दिखती है|

कश्मीर की इस समस्या पर प्रायः सब के सब  शुतुरमुर्ग की तरह सर छिपाते हैं, कश्मीरी हिन्दूओं की दुर्गति और व्यथा से  अनजान बनने की भंगिमा निभाते हैं| किन्तु आज नहीं तो कल उन्हें टेढ़े  प्रश्नों से आँख तो मिलानी ही होगी| अन्यथा एकतरफा सेक्युलरिज्म कल देश के  अन्य राज्यों में भी दुसरे दर्जे के नागरिक या शरणार्थी पैदा कर सकता है|  असम के हिन्दू अपनी को "लुप्त होने वाली प्रजाति" कहने भी लगे हैं| वस्तुतः  यही समस्या पश्चिम बंगाल, बिहार तथा उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों  में भी धीरे-धीरे सामने आ रही हैं| इन सब समस्याओं के प्रति विचार-विमर्श  में चुप्पी साधना ना तो न्याय है और ना ही बुद्धिमानी| आँख मूँदने से संकट  टलने वाला नहीं है| उससे आँख मिलाना ही उसका उपाय ढूंढने की और पहला कदम  है|

© अंशिका छाया

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