मदार (आक) अलौकिक और चमत्कारी वनस्पति


मदार एक बहुवर्षीय औषधीय पादप है। भारत के विभिन्न प्रान्तों में इसे भिन्न भिन्न नामो से जैसे मंदार, आक, अर्क और अकौआ भी जाना जाता है। इसका वृक्ष छोटा और पत्ते बरगद के पत्तों समान मोटे रोयेंदार होते हैं। इसका फूल सफेद छोटा मुकुट के सामान होता है इसी लिए इसे अंग्रेजी में Crown flower के नाम से जाना जाता है। फूल पर लाल-बैगनी रंगीन चित्तियाँ होती हैं। फल प्रायः आम के जैसा होता है जिनमें रूई के सामान सफ़ेद रेशे होतें हैं। आक की शाखाओं एवं पत्तों में दूध निकलता है। वह दूध विष का काम देता है।

आक के पौधे शुष्क, उसर और ऊँची भूमि में प्रायः सर्वत्र देखने को मिलते हैं। इस वनस्पति के विषय में यह भ्रान्ति फैली हुई है कि आक का पौधा विषाक्त होता है, जिससे मनुष्य की मृत्यु हो सकती है। किन्तु यह बात पुर्णतः सत्य नहीं है यह सत्य है कि आयुर्वेद ग्रन्थो में इसे उपविषों की श्रेणी में रखा गया है यदि इसका सेवन अधिक मात्रा में कर लिया जाये तो, उल्दी दस्त होकर मनुष्य की मृत्यु हो सकती है। इसके विपरीत यदि आक का सेवन उचित मात्रा में, योग्य तरीके से, कुशल चिकित्सक या वैद्य की निगरानी में किया जाये तो अनेक रोगों में इससे बड़ा उपकार होता है। आक में विष इसकी पत्तियों और दूध में अधिक होता है, अतः पत्तियों और दूध का प्रयोग बिना कुशल चिकित्सक की निगरानी अथवा सलाह के खाने या नाजुक अंगों पर लगाने से बचना चाहिए। जड का प्रयोग सावधानी के साथ किया जा सकता है।

तन्त्र जगत के जानकार व्यक्ति मदार को अवश्य जानता होगा। इसका तन्त्र में अति महत्वपूर्ण प्रयोग है। इससे स्वयमेव श्वेतार्क गणपति की उत्पत्ति होती है, जो जीवन के समस्त अभाव, दुःख, कष्ट, परेशानी, असफलता समाप्त कर देता है, सुख-समृद्धि-शांति-सुरक्षा-सफलता देता है।  इससे समस्त षट्कर्म आकर्षण-वशीकरण-मोहन-मारन-विद्वेषण-उच्चाटन-शान्ति-पुष्टि-कर्म किये जा सकते हैं।  यह साक्षात गणपति होतें है और तुरंत प्रभावी भी। इसका जड अनेक तंत्र प्रयोगों के काम आता है। इसकी जड़ को धारण मात्र करना अभिचार मुक्त कर सब प्रकार से सुरक्षा प्रदान करता है। हम अपने पूर्व के लेखों में अपने पेज अलौकिक शक्तियां और तन्त्र मार्ग पर श्वेतार्क और श्वेतार्क गणपति के बारे में  लिखते आये हैं अतः आज उनकी पुनरावृति न करते हुए आज केवल मदार के चिकित्सकीय गुणों के बारे में चर्चा करेंगे।

अर्क, आक या मदार की तीन जातियाँ पाई जाती है-
(१) रक्तार्क : इसके पुष्प पांच पर्ण से युक्त, बाहर से श्वेत रंग और भीतर लाल और बैंगनी रंग की चित्ती वाले, छोटे और कटोरीनुमा  होते हैं। इसमें दूध कम होता है।

(२) श्वेतार्क : इसका फूल लाल आक से कुछ बड़ा, हल्की पीली आभा लिये श्वेत करबीर पुष्प सदृश होता है। इसकी केशर भी बिल्कुल सफेद होती है। यह प्रायः मन्दिरों में लगाया जाता है। इसमें दूध अधिक होता है। तंत्र प्रयोगों में इसका अत्यधिक महत्त्व है। इसकी जड को साक्षात गणपति का स्वरुप माना जाता है और इससे समस्त प्रकार के षट्कर्म सिद्ध होते हैं।

(३) राजार्क : इसमें एक ही टहनी होती है, जिस पर केवल चार पत्ते लगते है, इसके फूल चांदी के रंग जैसे होते हैं, यह बहुत दुर्लभ जाति है।

मदार रक्तार्क

इसके अतिरिक्त आक की अन्य प्रजातियाँ भी पाई जाती है। जिसमें पिस्तई रंग के फूल लगते हैं।
मदार का हर अंग औषधि है और हर भाग उपयोगी है। यह सूर्य के समान तीक्ष्ण तेजस्वी और पारे के समान उत्तम तथा दिव्य रसायनधर्मा हैं। कहीं-कहीं इसे 'वानस्पतिक पारद' भी कहा गया है।

1. मदार के पीले पत्ते पर घी चुपड कर सेंक कर अर्क निचोड कर कान में डालने से आधा शिर दर्द जाता रहता है। बहरापन दूर होता है। दाँतों और कान की पीडा शाँत हो जाती है।

2. मदार के कोमल पत्ते मीठे तेल में जला कर अण्डकोश की सूजन पर बाँधने से सूजन दूर हो जाती है। तथा सरसों के तेल में पत्तों को जला कर गरमी के घाव पर लगाने से घाव अच्छा हो जाता है। एवं पत्तों पर कत्था चूना लगा कर पान समान खाने से दमा रोग दूर हो जाता है।

3. हरा पत्ता पीस कर लेप करने से सूजन पचक जाती है।

4. कोमल पत्तों के धूँआ से बवासीर शांत होती है।

5. कोमल पत्ते खाये तो ताप तिजारी रोग दूर हो जाता है।

6. मदार के पत्तों को गरम करके बाँधने से चोट अच्छी हो जाती है। सूजन दूर हो जाती है।

7. मदार के फूल को जीरा, काली मिर्च के साथ बालक को देने से बालक की खाँसी दूर हो जाती है।

8. मदार के फल की रूई रुधिर बहने के स्थान पर रखने से रुधिर बहना बन्द हो जाता है।

9. मदार का दूध लेकर उसमें काली मिर्च पीस कर भिगोये फिर उसको प्रतिदिन प्रातः समय मासे भर खाये 9 दिन में कुत्ते का विष शांत हो जाता है। परंतु कुत्ता काटने के दिन से ही खाये।

10. मदार का दूध पाँव के अँगूठे पर लगाने से दुखती हुई आँख अच्छी हो जाती है। बवासीर के मस्सों पर लगाने से मस्से जाते रहते हैं। बर्रे काटे में लगाने से दर्द नहीं होता। चोट पर लगाने से चोट शांत हो जाती है।

11. जहाँ के बाल झड़ उड गये हों वहाँ पर मदार का दूध लगाने से बाल उग आते हैं। तलुओं पर लगाने से महीने भर में मृगी रोग दूर हो जाता है।

12. मदार के दूध का फाहा लगाने से मुंह का लकवा सीधा हो जाता है।

13. मदार की छाल को पीस कर घी में भूने फिर चोट पर बाँधे तो चोट की सूजन दूर हो जाती है।

14. मदार की जड को दूध में औटा कर घी निकाले वह घी खाने से नहरूआँ रोग जाता रहता है।

15. मदार की जड को पानी में घिस कर लगाने से नाखूना रोग अच्छा हो जाता है।

16. मदार की जड छाया में सुखा कर पीस लें और उसमें गुड मिलाकर खाने से शीत ज्वर शांत हो जाता है।

17. मदार की जड 2 सेर लेकर उसको चार सेर पानी में पकाये जब आधा पानी रह जाये तब जड निकाल ले और पानी में 2 सेर गेहूँ छोडे जब जल नहीं रहे तब सुखा कर उन गेहूँ का आटा पिसकर पाव भर आटा की बाटी या रोटी बनाकर उसमें गुड और घी मिलाकर प्रतिदिन खाने से गठिया बाद दूर होती है। बहुत दिन की गठिया 21 दिन में अच्छी हो जाती है।

18. मदार की जड के चूर्ण में काली मिर्च पिस कर मिलाये और रत्ती -रत्ती भर की गोलियाँ बनाये इन गोलियों को खाने से खाँसी दूर होती है।

19. मदार की जड पानी में घिस कर लगाने से नाखूना रोग जाता रहता है।

20. मदार की जड के छाल के चूर्ण में अदरक का अर्क और काली मिर्च पीसकर मिलावे और 2-2 रत्ती भर की गोलियाँ बनावे इन गोलियों से हैजा रोग दूर होता है।

21. मदार की जड की राख में कडुआ तेल मिलाकर लगाने से खिजली अच्छी हो जाती है।

22. मदार की सूखी डँडी लेकर उसे एक तरफ से जलाये और दूसरी ओर से नाक द्वारा उसका धूँआ जोर से खींचे सर का दर्द तुरंत अच्छा हो जाता है।

23. मदार का पत्ता और डंठल पानी में डाल रखे उसी पानी से आबद्स्त ले तो बवासीर अच्छी हो जाती है।

24. मदार की जड का चूर्ण गरम पानी के साथ सेवन करने से उपदंश (गर्मी) रोग अच्छा हो जाता है। उपदंश के घाव पर भी मदार का चूर्ण छिडकना चाहिये। मदार ही के काढ़े से घाव धोएं।

25. मदार की जड के लेप से बिगडा हुआ फोडा अच्छा हो जाता है।

26. मदार की जड की चूर्ण 1 माशा तक ठण्डे पानी के साथ खाने से प्लेग होने का भय नहीं रहता।
27. मदार की जड का चूर्ण दही के साथ खाने से स्त्री के प्रदर रोग दूर होता है।

28. मदार की जड का चूर्ण 1 तोला, पुराना गुड़ 4 तोला, दोनों की चने की बराबर गोली बनाकर खाने से कफ की खाँसी अच्छी हो जाती है।

29. मदार की जड पानी में घीस कर पिलाने से सर्प विष दूर होता है।

30. मदार की जड का धूँआ पीने से आतशक (सुजाक) रोग ठीक हो जाता है। इसमें बेसन की रोटी और घी खाना चाहिये और नमक छोड देना चाहिये।

31. मदार की जड और पीपल की छाल का भस्म लगाने से नासूर अच्छा हो जाता है।

32. मदार की जड का चूर्ण का धूँआ पीकर उपर से बाद में दूध गुड पीने से श्वास बहुत जल्दी अच्छा हो जाता है।

33. मदार का दातून करने से दाँतों के रोग दूर होते हैं।

34. मदार की जड का चूर्ण 1 माशा तक खाने से शरीर का शोथ (सूजन) अच्छा हो जाता है।

35. मदार की जड 5 तोला, असगंध 5 तोला, बीजबंध 5 तोला, सबका चूर्ण कर गुलाब के जल में खरल कर सुखावे इस प्रकार 3 दिन गुलाब के अर्क में घोटे बाद में इसका 1 माशा चूर्ण शहद के साथ चाट कर उपर से दूध पीवे तो प्रमेह रोग जल्दी अच्छा हो जाता है।

36. मदार की जड की काडे में सुहागा भिगो कर आग पर फुला ले मात्रा 1 रत्ती 4 रत्ती तक यह 1 सेर दूध को पचा देता है। जिनको दूध नहीं पचता वे इसे सेवन कर दूध खूब हजम कर सकते हैं।

37. मदार की पत्ती और चौथाई सेंधा नमक एक में कूट कर हण्डी में रख कर कपरौटी आग में फूँक दे। बाद में निकाल कर चूर्ण कर शहद या पानी के साथ 1 माशा तक सेवन करने से खाँसी, दमा, प्लीहा रोग शाँत हो जाता है।

38. मदार का दूध लगाने से ऊँगलियों का सडना दूर होता है।

39. मदार की जड का चूर्ण गर्म और उत्तेजक होता है, यह संतुलित मात्र में सेवन किया जाये तो बल पुष्टिकारक होता है।

40. मदार की जड़ को कानों पर रखने से पुराना बुखार उतरता है।

उपरोक्त जानकारी और चिकित्सकीय गुणों के साथ अगर मदार या मदार के तन्त्र प्रयोगों और आध्यात्मिक-ईश्वरिय-दैविय गुणों को जोड़ दें तो हम पाते हैं की यह सामान्य सा दिखने वाला,सर्वत्र उपेक्षित रूप से पाया जाने वाला पौधा हमारे लिए एक ईश्वरीय वरदान है, जो हमारे समस्त कष्टों का हरण अपने आलौकिक  शक्ति और गुणों से कर सकता है। बस हमें इस और ध्यान देने की जरूरत है।

विशेष -
यह मेरा अनुरोध है की बिना किसी वैद्यकीय परामर्श  के कोई भी प्रयोग केवल यह पोस्ट पढकर न  करें। यह लेख जानकारी के उद्देश्य से लिखी गयी है।

मदार के अन्य नाम -
Calotropis gigantea, crown flower, monarch, host plant, pua kalaunu, milkweed,