पुराणों में वर्णित स्त्री के शुभ-अशुभ गुण

इन लक्षणों से समन्वित स्त्री समस्त सौभाग्य की अभिवृद्धि कारिणी होती है
जो भार्या ग्रह कार्य में दक्ष है जो प्रिय वादिनी है जिसके पति ही प्राणी और जो पति पर आना है वास्तव में वही भार्या है जो नित्य स्नान करके अपने शरीर को सुगंधित द्रव्य पदार्थों से सुवासित करने वाली है प्रिय वादिनी है अल्पाहारी है मितवा शनि है मितभाषी है सदा सब प्रकार के मंगलों से युक्त है जो निरंतर धर्म परायण है, निरंतर पति की प्रिय है, सदा सुंदर मुख वाली है, तथा जो रितु काल में ही पति के साथ सह गमन की इच्छा रखती है, वही भार्या है, इन लक्षणों से समन्वित स्त्री समस्त सौभाग्य की अभिवृद्धि कारिणी होती है, जिस मनुष्य की ऐसी भार्या है, वह मनुष्य नहीं देवराज इंद्र है।

जिस मनुष्य की भार्या विरूप नेत्रों वाली, पापिनी, कलहप्रिय और विवाद में बढ़ चढ़ कर बोलने वाली है, वह पति के लिए वास्तव में वृद्धावस्था ही है वास्तिक वृद्धावस्था व्रद्धावस्था नहीं है। जिसकी भार्या परपुरुष का आश्रय ग्रहण करने वाली है, दूसरे के घर में रहने की आकांक्षा रखती है, कुकर्म में संलग्न है तथा निर्लज्ज है, वह पति के लिए साक्षात वृद्धावस्था स्वरूप है।

जिस पुरुष की भार्या गुणों का महत्व समझने वाली, पति का अनुक्रम करने वाली और स्वल्प से भी स्वल्प वस्तु में संतुष्ट रहने वाली है पति के लिए वही सच्ची प्रियतमा है सामान्य प्रिया नहीं है।

दुष्ट पत्नी, दुष्ट मित्र तथा प्रत्युत्तर देने वाला भृत्य और सर्प युक्त घर में निवास साक्षात मृत्यु ही है।

जो स्त्री सर्प के कंठ में रहने वाले विष के समान है, जो सर्प के फलों के सदृश्य भयंकर है, जो रौद्र रस की साक्षात मूर्ति है, जो शरीर से कृष्ण वर्ण की है जो रक्त के सदृश्य लाल लाल नेत्रों के द्वारा दूसरे के हृदय को भयभीत कर देने वाली है, जो व्याघ्र के समान भयानक है, जो क्रोध वन वदना एवं प्रचंड अग्नि की ज्वाला की भांति धड़कने वाली और काक के समान जिह्वा लोलुप है भ्रमित चित्त वाली है तथा दूसरे के पूर्व आदि में जाने वाली अर्थात पर पुरुष की इच्छा रखने वाली है वह स्त्री कदापि सेव्य नहीं है

दुष्ट पत्नी, दुष्ट मित्र तथा प्रत्युत्तर देने वाला भृत्य और सर्प युक्त घर में निवास साक्षात मृत्यु ही है।