वृहस्पति द्वारा वर्णित नीतिसार

अब मैं अर्थशास्त्र आदि पर आश्रित नीतिसार कह रहा हूं जो राजाओं के साथ ही अन्य सभी के लिए भी हितकर तथा पुण्य, आयु और स्वर्ग आदि को प्रदान करने वाला है।।

 जो मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इस पुरुषार्थ चतुष्टय की सिद्धि चाहता है उसको सदैव सज्जनों की संगति करनी चाहिए दुर्जनों के साथ रहने से इस लोक अथवा परलोक में हित संभव नहीं है --

सद्भिः सङ्गं पकुर्वित प्रकुर्वीत सिद्धिकामः सदा नरः ।
नासद्भिरिहलोकाय परलोकाय वा हितम्।


क्षुद्र के साथ वार्तालाप और दुष्ट व्यक्ति का दर्शन नहीं करना चाहिए। शत्रुओं से सेवित व्यक्ति के साथ प्रेम न करें और मित्र के साथ विरोध न करें। मूर्ख शिष्य को उपदेश देने से, दुष्ट स्त्री का भरण पोषण करने से, तथा दुष्टों का किसी कार्य में सहयोग लेने से विद्वान पुरुष भी अंत में दुखी होता है। मूर्ख ब्राह्मण, युद्ध का प्रमुख क्षत्रिय, विवेक रहित वैश्य और  अक्षरसंयुक्त शुद्र का परित्याग तो दूर से ही कर देना चाहिए। काल की प्रबलता से शत्रु के साथ संधि और मित्र से विग्रह हो जाता है। अतः कार्य-कारण-भाव का विचार करके ही पंडित जन अपना समय व्यतीत करते हैं।



समय प्राणियों का पालन करता है। समय ही उनका संहार करता है। उन सभी के सोने पर समय जागता रहता है। अतः समय बड़ा ही दूरतिक्रम है अर्थात समय को जितना बड़ा ही कष्टसाध्य है।  समय पर ही प्राणी के पराक्रम का क्षरण होता है। समय आने पर ही प्राणी गर्भ में आता है। समय के आधार पर उसकी सृष्टि होती है और पुनः समय ही उस का संहार भी करता है। काल निश्चित ही नियम से नित्य सूक्ष्म गति वाला ही होता है तब भी हमारे अनुभव में उसकी गति दो प्रकार से होती है जिसका अंतिम परिणाम जगत का संग्रह ही होता है यह गति स्थूल एवं सूक्ष्म रूप में दोनों प्रकार की होती है।

वृहस्पति ने इंद्र से से नीतिसार का वर्णन किया था  जिसके कारण सर्वज्ञ होकर इंद्र ने दैत्यों का विनाश करके देवलोक का आधिपत्य प्राप्त किया था।
ब्राह्मण कल्प राजर्षियों को नित्य देवता एवं ब्राह्मण आदि का पूजन करना चाहिए तथा महान पातक को नष्ट करने वाले अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिए।

उत्तम प्रकृति वाले सज्जनों की संगति विद्वानों के साथ सत कथा का श्रवण और लोह रहित मनुष्य के साथ मैत्री संबंध स्थापित करने वाला पुरुष दुखी नहीं होता।

दूसरे की निंदा दूसरे का धन ग्रहण पराई स्त्री के साथ परिहार तथा पराए घर में निवास कभी नहीं करना चाहिए हितकारी अन्य व्यक्ति भी अपने बंद हुए हैं और यदि बंद हो अहितकर है तो वह भी अपने लिए अन्य है शरीर से ही उत्पन्न हुई व्याधि अहितकर होती है किंतु वन में उत्पन्न हुई औषधि उस व्याधि का निराकरण करके मनुष्य का हितसाधन करती है जो मनुष्य सदैव हित में तत्पर रहता है वही बंद हो है जो भरण पोषण करता है वही पिता है जिस व्यक्ति में विश्वास रहता है वही मित्र है और जहां पर मनुष्य का जीवन निर्वहन होता है वही उसका देश है।

जो आज्ञापालक है वही वास्तविक मृत्य सेवक है जो बीज अंकुरित होता है वही बीज है जो पति के साथ प्रिय संभाषण करती है वही वास्तविक भार्या है पिता के जीवन पर्यंत पिता के भरण पोषण में जो पुत्र लगा रहता है वही वास्तव में पुत्र है जो गुणवान है उसी का जीवन वास्तव में सार्थक है जो धर्म में प्रवृत्त है वही जीवित है जो गुणधर्म विहीन हैं उसका जीवन निष्फल है।

दुष्ट पत्नी, दुष्ट मित्र तथा प्रत्युत्तर देने वाला भृत्य और सर्प युक्त घर में निवास साक्षात मृत्यु ही है।

मनुष्य को दुर्जनों की संगति का परित्याग करके सज्जनों की संगति करनी चाहिए और दिन रात्रि पुण्य का संचयन करते रह हुए नित्य अपनी अनित्यता का स्मरण रखना चाहिए।

वेश्या में (पुरुष विषयक) अनुराग नहीं हो सकता।


दैववश कभी अल्प समर्थवान व्यक्ति भी शक्तिशाली हो सकता है, कृतज्ञ व्यक्ति भी कभी सुकृत कर सकता है, अग्नि में कभी शीतलता भी आ सकती है, हमें हिम में उष्णता भी आ सकती है किंतु वेश्या में (पुरुष विषयक) अनुराग नहीं हो सकता।

घर के अंदर भयंकर सर्प देख लिए जाने पर, चिकित्सा होने पर भी रोग बने रहने पर, बाल युवा अवस्था में से युक्त यह शरीर काल से आवृत है यह समझने पर भी कौन ऐसा व्यक्ति है?   जो धैर्य धारण कर सकता है?